July 21, 2009

कोई भी हादसा अब वक़्त का पाबन्द नहीं

कुछ ख़ास किताबों से है मंसूब रोज़गार,
वो पढ़ रहा हूँ मैं कि जिसमें दिल नहीं मिरा.

तुम्हारी दोस्त है ज़ात से तो अच्छा है,
न रखो रंजिशें हालात से तो अच्छा है.
चलो अच्छा है दरीचों की ज़द नहीं इतनी,
दूर हो मंज़रे-जुल्मात से तो अच्छा है.
तुम्हारे ज़हन से कुछ इल्म की बू आती है,
लबों को दूर रखो बात [...]