कुछ ख़ास किताबों से है मंसूब रोज़गार,
वो पढ़ रहा हूँ मैं कि जिसमें दिल नहीं मिरा.
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तुम्हारी दोस्त है ज़ात से तो अच्छा है,
न रखो रंजिशें हालात से तो अच्छा है.
चलो अच्छा है दरीचों की ज़द नहीं इतनी,
दूर हो मंज़रे-जुल्मात से तो अच्छा है.
तुम्हारे ज़हन से कुछ इल्म की बू आती है,
लबों को दूर रखो बात [...]