July 24, 2009

के कू-ऐ-यार नहीं “फैज़” सू-ऐ-दार भी नहीं

मिरी तामीर में कुछ हाथ ज़माने के लगे हैं,
इक मुद्दत हुई हम साथ ज़माने के लगे हैं.
ऊंचा ओहदा, मेयार, दौलत, आलीशान मकां, सब,
हमारे पीछे ये हजरात ज़माने के लगे हैं.
इतनी फ़ुर्सत कहाँ के इल्म पे सोचें तालिब-ऐ-इल्म,
हल जो करने में सवालात ज़माने के लगे हैं.
एक मुद्दत से मिरा गुस्सा मुझे छोड़ चुका है,
मेरी अना पे [...]