October 30, 2009...1:41 am

मुझको शक़ वो दीवारों

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बंद कमरे में नजारों की फ़ज़ा पायेगा,
मिज़ाज अपना जब भी शायराना पायेगा.
उसकी आंखों में एक आसमान दिखता है,
ज़मीं पे रहने का वो कुछ तो सिला पायेगा.
यकीं से आपके मस्जिद में ख़ुदा गया,
मुझको शक़ वो दीवारों से निभा पायेगा.

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