Unbelievable Illusion…..+

Kishore Modi
To
BCC Me

:This begins in the middle of the actual act. To see the beginning of it, click at the beginning of the progress bar at the bottom.

Unbelievable Illusion
You might not believe this one!
One of the best magic presentation and it is short.
This guy is good. How does he do it?

http://www.flixxy.com/darcy-oakes-jaw-dropping-dove-illusions-britains-got-talent-2014.htm#.U1lTlzP0EFQ.aolmail

+

कलेजे में हजारों दाग ,दिल में हसरतें लाखों,
कमाई ले चला हूँ साथ अपने जिंदगी भर की।
आगा शायर

जब मैंने कहा की मरता हूँ, मुंह फेर के बोले,
सुनते तो हैं पर इश्क के मारे नहीं देखे।
सादिक अली हुसैन

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।
मजरूह सुल्तानपुरी

हर एक बात पे कहते हो तुम की तू क्या है,
तुम ही कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
खुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है।
रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद से कहिये की आरज़ू क्या है।
हुआ है शाह का मुसाहिब,फिर है इतराता
वगरना शहर में गालिब की आबरु क्या है ।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नही कायल,
जो आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है।
गालिब
मत पूछ क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख की क्या रंग है तेरा मेरे आगे।
ईमान मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र,
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।
गो हाथ को जुम्बिश नहीं, आँखों में तो दम है,
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।
गालिब
दो -चार लफ्ज़ कह के मैं खामोश हो गया,
वो मुस्करा के बोले,बहुत बोलते हो तुम।
अ अ बर्क़
जब तक जिये, बिखरते रहे,टूटते रहे,
हम साँस -साँस क़र्ज़ की सूरत अदा हुए।
निदा फाज़ली
ये और बात है की तआरुफ़ न हो सके,
हम ज़िन्दगी के साथ बहुत दूर तक गए।
खुर्शीद अहमद

 

अमीर मीनाईवो भी मेरे पास से गुजरा इसी अंदाज से,
मैंने भी जाहिर किया,जैसे उसे देखा ना हो।
साबिर
दिल की मजबूरी भी क्या शै है की दर से अपने,
उसने सौ बार उठाया तो मैं सौ बार आया।
हसरत मोहानी
तुम ना आओगे तो मरने की हैं सौ तदवीरें,
मौत कुछ तुम तो नहीं हो कि बुला भी न सकूं।
गालिब
आ गई तेरे बीमार के मुंह पे रौनक,
जान क्या जिस्म से निकली ,कोई अरमान निकला।
फानी
बात करनी तक तुम्हें आती ना थी,
ये हमारे सामने की बात है।
दाग़
है कुछ ऎसी ही बात जो चुप हूँ,
वरना क्या बात कर नहीं आती।
गालिब
जी बहुत चाहता है रोने को,
है कोई बात आज होने को।
मीर
तुम आये हो ना शब्-ए-इंतज़ार गुज़री है
तलाश में है सहर बार-बार गुज़री है।
वो बात सारे फ़साने में जिसका जिक्र ना था,
वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है।
न गुल खिले हैं ,न उनसे मिले, न मय पी है,
अजीब रंग में अबके बहार गुजरी है।
फैज़
बहाने और भी होते जो जिंदगी के लिये,
हम एक बार तेरी आरजू भी खो देते।
मजरूह सुल्तानपुरी
दिल वो काफ़िर है की मुझ को न दिया चैन कभी,
बेवफा तू भी उसे ले के पशेमाँ होगा।
पशेमाँ= परेशान
कुर्बान अली

कुछ खास

दिल ले के मुफ्त कहते हैं कुछ काम का नहीं,
उल्टी शिकायतें हुईं , एहसान तो गया ।दाग़कत्ल और मुझ-से सख्त-जान का कत्ल,
तेग देखो, जरा कमर देखो।अज़ीज़
एक रात आपने उम्मीद पे क्या रखा है,
आज तक हमने चिरागों को जला रखा है।
शा़ज
ऐ दोस्त हमने तर्क-ऐ-मोहब्बत के बावजूद,
महसूस की है तेरी ज़रुरत कभी-कभी।
नासिर काजमी
ईरादे बांधता हूँ , सोचता हूँ, तोड़ देता हूँ,
कहीं ऐसा ना हो जाए, कहीं वैसा ना हो जाए।
हफीज जालंधरी
तुम मेरे लिये अब कोई इल्जाम ना ढूंढो ,
चाहा था इक तुम्हे यही इल्जाम बहुत है।
साहिर लुध्यानवी
इस ‘नहीं’ का कोई इलाज नहीं
रोज कहते हैं आप , ‘आज’ नहीं।
दाग़
इक उमर कट गई है तेरे इंतजार में,
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिनसे एक रात
फिराक गोरखपुरी
खैर गुजरी की न पहुँची तेरे दर तक वरना,
आह ने आग लगा दी है जहां ठहरी है।
हसरत मोहानी
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक।
गालिब
वो आए बज्म में इतना तो ‘मीर’ ने देखा,
फिर उसके बाद चिरागों में रौशनी न रही।
मीर
आईना देख अपना सा मुंह ले के रह गए ,
साहब को दिल न देने पे कितना गरुर था।
गालिब
न जाने किस लिये उमीदवार बैठा हूँ,
इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुजर भी नहीं।
फैज़
जो छुपाने की थी ,वो बात बता दी मुझको,
जिंदगी तूने बहुत सख्त सजा दी मुझको।
सुलेमान अख्तर
जब आप जा ही रहे हैं तो तकल्लुफ़ कैसा,
ये जरुरी तो नहीं हाथ मिलाया जाए।
स अ रज्जाक
खामोशी

हश्र के दिन मेरी चुप का माजरा,
कुछ न कुछ तुम से भी पूछा जाएगा।हफीज जालंधरीक्या क्यामत है शब-ऐ-वस्ल खामोशी उसकी,
जिसकी तस्वीर को भी नाज है गोयाई* का।
गोयाई = बोलने का
रियाज़ खैराबादी
इफ्शां-ऐ-राज*, शाने-वफ़ा, इमि्तहाने-सब्र**,
आज एक खामोशी ने बड़े हक़ अदा किये।
*= रहस्य बताना,
**= धर्य का इम्तिहान
आरजू लखनवी
हश्र भी गुजरा , हश्र में भी ये सोच के हमने कुछ न कहा,
गम की हिकायत* कौन सुनेगा,गम की हिकायत क्या कहिये ।
*= कहानी
फा़नी

अफसाना

मेरे रोने का जिसमे किस्सा है ,
उम्र का बेहतरीन हिस्सा है।
अज्ञात
बात बढ़ कर फ़साना बनती है,
बात सुनता नहीं है जब कोई।
राही कुरैशी
खैर इन बातों में क्या रखा है,किस्सा ख़त्म कर,
मैं तुझे हमदर्द समझा था ये मेरी भूल थी।
रशीद अफरोज
यूँ ही जरा खामोश जो रहने लगे हैं हम,
लोगों ने कैसे कैसे फसाने बना लिये।
रजिया बेगम ख्वाजा
रात कम है ना छेड़ हिज्र की बात ,
ये बड़ी दास्ताँ है प्यारे।
हफीज जालंधरी
तुम ही ना सुन सको अगर किस्सा-ऐ-गम सुनेगा कौन,
किसकी जबान खुलेगी फिर हम ना अगर सुना सके।
हफीज जालंधरी
कहतें हैं जवानी की कहानी जो कभी ,
पहले हम देर तलक बैठ के रो लेते हैं।
शाद अजीमाबादी
कहके ये फेर लिया मुंह मेरे अफसाने से,
फायदा रोज कही बात के दोहराने से।
फहीम गोरखपुरी
हमारी दास्ताँ शहरों की दीवारों पे चस्पां है,
हमें ढूंढेगी दुनिया कल पुराने इश्तहारों में.

 Courtesy Kishor Mody

2 ટિપ્પણીઓ

Filed under Uncategorized

2 responses to “Unbelievable Illusion…..+

  1. અજબ જાદુનો ખેલ- કેવી રીતે આ લોકો આ કરતા હશે એવો પ્રશ્ન થાય

    સુંદર હિન્દી અવતરણો

  2. pragnaju

    અમારા મા શ્રી કીશોરભાઇ ઘણા સરસ ઇ મેઇલ દ્વારા માહિતી મોકેલે છે તેમને પણ ધન્યવાદ

પ્રતિસાદ આપો

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / બદલો )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / બદલો )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / બદલો )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / બદલો )

Connecting to %s