भूल मत ! एक ही यही किनारा !!

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कबीर ने कहा है–

“लिखा लिखी की है नहीं, देखा देखी बात।’

पर बिना इशारों के आंख तुम्हारी उस तरफ जाएगी न। तो खयाल रखना, कहीं मेरी अभिव्यंजना ही बाधा न बन जाए। कहीं ऐसा न हो कि तुम सुनने में ही रस लेने लगो। कहीं ऐसा न हो कि सुनने का संगीत ही तुम्हें पकड़ ले। कहीं ऐसा न हो कि सुनना ही तुम्हारी बेहोशी हो जाए। कहीं यह मनोरंजन न बन जाए। जागरण बने तो ठीक, मनोरंजन बने तो चूक गये। तो तुम मेरे पास भी आये और दूर ही रह गये। मेरे शब्दों को मत पकड़ना। उनका उपयोग कर लेना। और उपयोग होते ही उन्हें ऐसे ही फेंक देना जैसे खाली चली हुई कारतूस को फेंक देते हैं। फिर उसे रखने का कोई अर्थ नहीं। चली कारतूस को कौन ढोता है? और जो ढोयेगा, वह किसी दिन मुसीबत में पड़ेगा। वह काम नहीं आयेगी। जिस दिन तुम्हें जरा-सी झलक मिली, उसी दिन शब्द चली हुई कारतूस हो गये।

पूछा है, “एक ही बात आप कहते हैं अनेक-अनेक ढंगों से। पर जब भी आपको सुनता हूं तो उस समय यही लगता है कि पहली बार सुन रहा हूं।’

मनवा ! समझ ; गयी ना बीत!

जब जागे तब हुआ सबेरा ,

सोवत ना तव मीत !

मनवा ! समझ ; गयी ना बीत !!

तू क्या ढूंढ़े ?  ढूंढ़ रहा वो

देखत बिनु दिन-रैन ;

जब लग़ तू न सिधारे पथ पर

रहै न उसको चैन !

मनवा ! सोवत क्यों ?  नहीं रैन !!

जाग , मूरख ! अब कहं लग सोवत ?

बीत रही है बेला ;

आयी खोय , रहेगा सोवत ,

मिटै न भव-भव खेला !

चल , जग ! समझ :  गयी ना बेला !!

क्या सोचे ?  सुन ; पियु पुकारे ;

ऊठ , चल ! छोड़ गठरियां !

एक सहारा ,  ओर न आरा ,

पिकी पकड़ ड़गरियां !

भूल मत ! एक ही  यही किनारा !!

3 Comments

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3 responses to “भूल मत ! एक ही यही किनारा !!

  1. Sharad Shah

    ओशोके यह वचन और कबिरजीकी वाणी, ह्र्दयको न छु लें उसे हृदयकी कोटिमें रखना भी उचित नहीं. मगर कितने ही प्यारे वचन हो हमारी बेहोशी उतनी सघन है हम उस उंगलीको ही पकड लेते है जो चांदकी और ईशारा करती है और परिणामतः हम चांद और चांदका सौंदर्य चुक जाते है.
    हर बुध्धपुरुषने हजार रुपसे हमे समजाया है, इशारे पर ईशारे किये, मगर हम बडे ढीढ है. उन बुध्ध्पुरुषोके मंदिर, सिनागोग, चर्च, मस्जीद और गुरुद्वारा बनाते रहे और हद तो यह है की फिर उसके लीए मारकाट तक करते रहते है और जरा शर्म तक नहीं. देह तो ईन्सानका मिल गया पर,भितरका पशु जल्द मरता ही नहीं.
    यह अमृत वचन हम सबका जिवन अमृतमय बनाये यही प्रार्थना.

  2. હાઈસ્કુલ અભ્યાસ કાળમાં મને ગમતું ગીત જે હું પ્રાર્થનામાં ગવડાવતો એની યાદ આવી ગઈ .આ ગીત હતું .

    ઉઠ જાગ મુસાફિર!

    ઉઠ જાગ મુસાફિર! ભોર ભઈ,
    અબ રૈન કહાં જો સોવત હૈ.
    જો સોવત હૈ સો ખોવત હૈ,
    જો જાગત હૈ સો પાવત હૈ.
    ઉઠ જાગ મુસાફિર! ભોર ભઈ
    અબ રૈન કહાં જો સોવત હૈ.

    ટુક નીંદ સે અંખિયાં ખોલ જરા
    પલ અપને પ્રભુ સે ધ્યાન લગા,
    યહ પ્રીતિ કરન કી રીતિ નહીં,
    જગ જાગત હૈ,તૂ સોવત હૈ .

    તૂ જાગ જગત કી દેખ ઉડ઼ન,
    જગ જાગા તેરે બંદ નયન,
    યહ જન જાગ્રતિ કી બેલા હૈ,
    તૂ નીંદ કી ગઠરી ઢોવત હૈ.

    લડ઼ના વીરોં કા પેશા હૈ,
    ઇસમેં કુછ ભી ન અંદેશા હૈ,
    તૂ કિસ ગફલત મેં પડ઼ા-પડ઼ા,
    આલસ મેં જીવન ખોવત હૈ.

    હૈ આજાદી કા લક્ષ્ય તેરા,
    ઉસમેં અબ દેર લગા ન જરા,
    જબ સારી દુનિયા જાગ ઉઠી
    તૂ સિર ખુજલાવત સોવત હૈ.
    -વંશીધર શુક્લ

  3. મહમદ રફીના સુરીલા કંઠે ઉપરનું ભજન ગીત આ વિડીયોમાં કેટલું દીપી ઉઠે છે.

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