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અલબેલા ખત્રી રાષ્ટ્રીય કક્ષાના હાસ્ય કવિ

અલબેલા ખત્રી રાષ્ટ્રીય કક્ષાના હાસ્ય કવિ હતા. સુરતમાં રહીને દેશ-વિદેશમાં પ્રસ્તુતિ કરતાં. તેમના ધારદાર કટાક્ષ વાગી જાય તેવાં રહેતાં. . અલબેલા આજે આપણી વચ્ચે નથી, પણ તેની યાદોં છે.

અલબેલા ખત્રીની યાદ તાજી થઈ. તેઓ રાષ્ટ્રીય કક્ષાના હાસ્ય કવિ હતા. સુરતમાં રહીને દેશ-વિદેશમાં પ્રસ્તુતિ કરતાં. તેમના ધારદાર કટાક્ષ વાગી જાય તેવાં રહેતાં. એક હાસ્ય કવિ સંમેલનમાં તેમની આ કવિતા સાંભળીને હું પહેલાં તેમનો ફેન અને પછી મિત્ર બની ગયો હતો. અલબેલા આજે આપણી વચ્ચે નથી, પણ તેની યાદોં છે.
हुस्न है, मदिरायें है, संगीत है और पान है
बार में जब आ गया तो भाड़ में ईमान है
बाप को चश्मा नहीं और मन्दिरों को दान है
वो समझते हैं इसे, ये स्वर्ग का सोपान है
राज है पाखंडियों का, क़ैद में संविधान है
उन्नति के पथ पे यारो अपना हिन्दुस्तान है
टिड्डियों की भान्ति बढ़ते जा रहे हैं आदमी
खेत से ज़्यादा घरों में पैदा -ए – फ़स्लान है
नोट नकली, दूध नकली, नकली बिकती है दवा
प्यारे नखलिस्तां नहीं है, ये तो नकलिस्तान है
‘अन्धा पीसे, कुत्ता खाये’ को कहावत मत कहो
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है
क्यों न अय्याशी करे वह, लॉटरी जब लग गई
बाप उसका मर गया, वो बन गया धनवान है
लाज लुटती है तो लुट जाये, उन्हें चिन्ता नहीं
काम मिल जाये फ़िलिम में, बस यही अरमान है
हाय रे ! कुछ नोट ले कर, बूढ़े बाबुल ने कहा
शेख साहेब ध्यान से…. बच्ची मेरी नादान है
ठरकी रोगी सोचता है नर्स तो पट जाएगी
यह कोई ज्योतिष नहीं है,बस मेरा अनुमान है
उसने जूठन फेंक दी तो ये उठा कर खा गया
वो भी इक इन्सान था और ये भी इक इन्सान है
दर्द ये महंगाई का है, बाम क्या काम आएगा ?
इसकी खातिर उस गली में भांग की दूकान है
क्या कहूँ ‘अलबेला’ अब मैं ग़ज़ल का अनुभव मेरा
बहर में कहना कठिन है, बे-बहर आसान है
जय हिन्द !
-अलबेला खत्री

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